रोहतक: पिछले कुछ वर्षों में कैंसर के इलाज के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है। इन बदलावों में सबसे महत्वपूर्ण प्रगति इम्यूनोथेरेपी के रूप में सामने आई है। यह ऐसा उपचार है जो शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को कैंसर से लड़ने के लिए मजबूत और सक्रिय बनाता है।
इम्यूनोथेरेपी एक ऐसी थेरेपी है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने में मदद करती है। सामान्य रूप से हमारा इम्यून सिस्टम संक्रमण और असामान्य कोशिकाओं से हमारी रक्षा करता है। लेकिन कैंसर कोशिकाएं बहुत चालाक होती हैं और वे अक्सर इम्यून सिस्टम से छिप जाती हैं। इम्यूनोथेरेपी दवाएं इन छिपी हुई कैंसर कोशिकाओं को फिर से पहचानने में मदद करती हैं। इसे सरल शब्दों में समझें तो यह इम्यून सिस्टम पर लगे “ब्रेक” को हटाने जैसा है, जिससे वह कैंसर पर अधिक प्रभावी तरीके से हमला कर सके।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल द्वारका के मेडिकल ऑन्कोलॉजी, विभाग के डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. पियूष बाजपेयी ने बताया “शुरुआत में इम्यूनोथेरेपी का उपयोग मुख्य रूप से एडवांस स्टेज के कैंसर में किया गया, जहां इसके अच्छे परिणाम सामने आए। खासतौर पर फेफड़ों का कैंसर, मेलेनोमा (स्किन कैंसर), ब्लैडर कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, हेड एंड नेक कैंसर और कुछ पेट व इसोफेगस (फूड पाइप) के कैंसर में इसका लाभ देखा गया। कुछ एडवांस कैंसर मरीजों में इस थेरेपी से कई वर्षों तक बीमारी को कंट्रोल में रखने में मदद मिली है। कुछ विशेष प्रकार के कैंसर में लगभग 15–20 प्रतिशत मरीजों को लंबे समय तक फायदा मिलता है।“
डॉ. पियूष ने आगे बताया “अब इम्यूनोथेरेपी का उपयोग सर्जरी से पहले भी किया जाने लगा है। पहले इसे अधिकतर एडवांस बीमारी में दिया जाता था, लेकिन अब शोध से यह पता चला है कि जब ट्यूमर शरीर में मौजूद होता है, उसी समय इम्यूनोथेरेपी देने से इम्यून सिस्टम बेहतर प्रतिक्रिया दे सकता है। फेफड़ों का कैंसर, मेलेनोमा, ब्लैडर कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर और गैस्ट्रो-इसोफेगल कैंसर जैसे मामलों में यह तरीका उत्साहजनक परिणाम दिखा रहा है। इससे ट्यूमर को पूरी तरह निकालने की संभावना बढ़ सकती है और कैंसर दोबारा होने का रिस्क कम हो सकता है। हालांकि इम्यूनोथेरेपी हर मरीज पर एक जैसा असर नहीं करती। कुछ मरीजों में बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है, जबकि कुछ में अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। कई बार डॉक्टर ट्यूमर या खून में कुछ विशेष मार्कर की जांच करते हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि इलाज से कितना फायदा होगा। मरीज की अच्छी पोषण स्थिति और सामान्य फिटनेस भी इलाज को सहने और बेहतर परिणाम पाने में मदद करती है।“
साइड इफेक्ट्स की बात करें तो इम्यूनोथेरेपी में आमतौर पर कीमोथेरेपी की तुलना में कम बाल झड़ते हैं और कम मतली होती है। लेकिन चूंकि यह इम्यून सिस्टम को सक्रिय करती है, इसलिए कभी-कभी यह शरीर के सामान्य अंगों पर भी असर डाल सकती है। इसके कारण दस्त (लूज मोशन्स), त्वचा पर रैश या खुजली, सांस लेने में तकलीफ, हार्मोन असंतुलन से थकान या वजन में बदलाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि इन लक्षणों की जानकारी समय पर डॉक्टर को दे दी जाए तो अधिकांश साइड इफेक्ट्स का सफल इलाज संभव है।
यदि किसी मरीज को लगातार दस्त, सांस फूलना या खांसी, अत्यधिक कमजोरी या चक्कर, तेजी से फैलता हुआ स्किन रैश, बुखार या तेज पेट दर्द हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। साइड इफेक्ट्स का समय पर उपचार गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है।
मरीजों और उनके परिवारों के लिए यह समझना जरूरी है कि इम्यूनोथेरेपी कोई जादू नहीं है, लेकिन यह कैंसर उपचार में एक बड़ी मेडिकल प्रगति जरूर है। इसने कई प्रकार के कैंसर में मरीजों की जीवन अवधि और जीवन की गुणवत्ता दोनों में सुधार किया है। सही मरीज का चयन, नियमित मॉनिटरिंग और समय पर सलाह के साथ इम्यूनोथेरेपी आज कैंसर देखभाल में नई उम्मीद लेकर आई है।

