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Saturday, February 21, 2026

लगातार थकान और बार-बार इंफेक्शन को न करें नजरअंदाज, हो सकता है ब्लड डिसऑर्डर


लगातार थकान और बार-बार इंफेक्शन को न करें नजरअंदाज, हो सकता है ब्लड डिसऑर्डर

ग्वालियर: ब्लड डिसऑर्डर यानी रक्त संबंधी बीमारियाँ उन स्थितियों का बड़ा समूह हैं, जो शरीर की ब्लड सेल्स को बनाने, नियंत्रित करने या सही तरीके से काम करने की क्षमता को प्रभावित करती हैं। ये बीमारियाँ हल्की और मैनेजेबल भी हो सकती हैं और कुछ मामलों में गंभीर व जानलेवा भी बन सकती हैं। अच्छी बात यह है कि आज जागरूकता, एडवांस डायग्नोस्टिक टेस्ट और आधुनिक ट्रीटमेंट ऑप्शन की मदद से अधिकांश ब्लड डिसऑर्डर का प्रभावी इलाज संभव है और कई मामलों में पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है।


रक्त विकारों को सामान्य रूप से रेड ब्लड सेल, व्हाइट ब्लड सेल, प्लेटलेट और बोन मैरो से जुड़ी समस्याओं में बांटा जाता है। आयरन-डिफिशिएंसी एनीमिया, थैलेसीमिया और सिकल सेल डिजीज जैसी रेड ब्लड सेल से जुड़ी बीमारियों में मरीज को कमजोरी, चक्कर आना, सांस फूलना और त्वचा का पीला पड़ना जैसे लक्षण दिख सकते हैं। थैलेसीमिया मेजर और सिकल सेल जैसी जेनेटिक कंडीशन में अक्सर लंबे समय तक इलाज की जरूरत होती है और कई मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) एक क्योर देने वाला विकल्प साबित होता है।


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली के क्लिनिकल हीमैटोलॉजी, हीमैटो-ऑन्कोलॉजी एवं बीएमटी विभाग की कंसल्टेंट डॉ. मालिनी गर्ग ने बताया “व्हाइट ब्लड सेल डिसऑर्डर में ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और इम्यून-डिफिशिएंसी जैसी बीमारियाँ शामिल हैं। इनमें बार-बार इंफेक्शन होना, लंबे समय तक बुखार रहना, बिना कारण वजन कम होना या लिम्फ नोड्स का बढ़ना जैसे संकेत मिल सकते हैं। समय पर जांच और डायग्नोसिस से इलाज के नतीजे काफी बेहतर होते हैं। वहीं प्लेटलेट और ब्लीडिंग डिसऑर्डर जैसे आईटीपी, हीमोफीलिया या क्लॉटिंग एबनॉर्मैलिटी में मामूली चोट पर ज्यादा खून बहना, बार-बार नाक से खून आना या सर्जरी के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। आधुनिक थेरेपी से इन स्थितियों को अच्छी तरह कंट्रोल किया जा सकता है। कुछ गंभीर स्थितियों में बोन मैरो खुद ही पर्याप्त और स्वस्थ ब्लड सेल्स बनाना बंद कर देता है, जैसे एप्लास्टिक एनीमिया या एमडीएस। ऐसे मामलों में कमजोरी, बार-बार इंफेक्शन और ब्लीडिंग एपिसोड देखने को मिलते हैं। इन रोगों में लंबे समय के समाधान के लिए बीएमटी जरूरी हो सकता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांट, जिसे हीमैटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट भी कहा जाता है, तब किया जाता है जब मरीज का बोन मैरो सामान्य रूप से काम नहीं कर पा रहा हो। यह हाई-रिस्क या रिलेप्स ल्यूकेमिया, थैलेसीमिया मेजर, सिकल सेल डिजीज, एप्लास्टिक एनीमिया और कुछ जन्मजात बीमारियों में जीवनरक्षक साबित हो सकता है।“


आज बीएमटी के लिए डोनर के कई विकल्प उपलब्ध हैं, जैसे मैच्ड सिबलिंग डोनर, रजिस्ट्री से मैच्ड अनरिलेटेड डोनर और हैप्लो-आइडेंटिकल यानी आधा मैच डोनर। बेहतर इंफेक्शन कंट्रोल, एडवांस कंडीशनिंग रेजीमेन और पोस्ट-ट्रांसप्लांट मॉनिटरिंग के कारण ट्रांसप्लांट की सफलता दर में काफी सुधार हुआ है। खासकर बच्चों और युवाओं में समय पर इलाज शुरू होने पर क्योर रेट काफी बेहतर देखी गई है।


डॉ. मालिनी ने आगे बताया “ब्लड डिसऑर्डर को लेकर कई मिथक भी प्रचलित हैं। लोग मानते हैं कि ये बीमारियाँ बहुत दुर्लभ हैं या इनके लक्षण हमेशा स्पष्ट दिखते हैं, जबकि कई मामलों में बीमारी लंबे समय तक बिना लक्षण के बढ़ती रहती है। बोन मैरो डोनेशन को लेकर भी डर होता है, जबकि आज अधिकांश डोनेशन सुरक्षित ब्लड-फिल्टरिंग प्रोसेस के जरिए होते हैं और असुविधा अस्थायी होती है। यह भी जरूरी है समझना कि बीएमटी सिर्फ कैंसर मरीजों के लिए नहीं, बल्कि कई नॉन-कैंसर कंडीशन में भी क्योर का विकल्प है। हीमैटो-ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, चुनिंदा मामलों में CAR-T थेरेपी और प्रिसिजन डायग्नोस्टिक्स ने इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। अब ट्रीटमेंट केवल सर्वाइवल तक सीमित नहीं है, बल्कि मरीज की बेहतर क्वालिटी ऑफ लाइफ पर भी फोकस करता है।“


लगातार थकान, बार-बार इंफेक्शन, बिना कारण चोट के निशान, वजन कम होना, हड्डियों में दर्द या लंबे समय तक बुखार जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर ब्लड टेस्ट, बोन मैरो स्टडी और जेनेटिक स्क्रीनिंग के जरिए सही डायग्नोसिस संभव है।


बोन मैरो ट्रांसप्लांट और आधुनिक हीमैटो-ऑन्कोलॉजी ट्रीटमेंट डर का नहीं, बल्कि उम्मीद का प्रतीक हैं। सही समय पर विशेषज्ञ से परामर्श और उचित इलाज जीवन बचा सकता है। यदि आपको या आपके किसी परिजन को ऐसे लक्षण दिखें, तो जांच में देरी न करें, क्योंकि समय पर उठाया गया कदम ही सबसे बड़ा अंतर ला सकता है।